गणेशोत्सव के पावन पर्व को नजदीक आते देख छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में तैयारियां जोरों पर हैं। इस बार त्योहारी सीजन को और अधिक खास व पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए मूर्तिकारों द्वारा अलग-अलग थीम पर भगवान गणेश की भव्य और अनोखी मूर्तियां तैयार की जा रही हैं। मूर्तिकार ग्राहकों की पसंद और उनके क्रिएटिव आइडिया के अनुसार मूर्तियों को नया स्वरूप दे रहे हैं। इन खास मूर्तियों में बांस, पूजा सामग्री, मोती, खाने योग्य दालों और धूप-अगरबत्ती जैसी सामग्रियों का अनूठा उपयोग किया गया है. इन कलाकृतियों को तैयार करने में कारीगरों को तीन महीने तक का कड़ा परिश्रम करना पड़ा है.
30 सालों से चली आ रही है पारंपरिक कला रायपुर के रायपुरा इलाके में निवास करने वाले शिवचरण यादव का परिवार पिछले लगभग 30 वर्षों से गणेश की आकर्षक मूर्तियां बनाने का कार्य कर रहा है। इस पारंपरिक और रचनात्मक कार्य में परिवार के दोनों बेटे भी अपने पिता का पूरा सहयोग दे रहे हैं और पिछले 15 सालों से लगातार मूर्तियां बना रहे हैं। स्थानीय समितियों, जैसे रामसागर पारा की एक समिति द्वारा पिछले 17 सालों से लगातार इन्हें ही मूर्ति का ऑर्डर दिया जाता है. यह परिवार केवल सीमित और चुनिंदा ऑर्डर ही स्वीकार करता है, जिसके लिए समितियों के लोग तीन महीने पहले ही एडवांस बुकिंग करा लेते हैं।
बांस और पूजा सामग्री से बनी विशेष मूर्तियां इस बार की सबसे बड़ी खासियत बांस से तैयार की गई गणेशजी की मूर्ति है। मूर्तिकार राहुल यादव बताते हैं कि इस मूर्ति में बिल्कुल भी मिट्टी का इस्तेमाल नहीं किया गया है, बल्कि इसे पूरी तरह लकड़ी और पेपर से तैयार किया गया है। बांस के छोटे-छोटे टुकड़ों की कटिंग कर और छाल निकालकर उन्हें बेहद बारीकी से जोड़ा गया है, जिस पर करीब 40 से 50 हजार रुपए की लागत आई है. इसके अलावा, अन्य मूर्तियों को पूजा सामग्री जैसे नारियल के जूट, रुद्राक्ष, मौली धागा, कमल गट्टे की माला और मोतियों से सजाया गया है। वहीं रुद्राक्ष और मौली धागा का भी मूर्तियों में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा मोतियों से भी सजावट की गई है। मोतियों से निर्मित मूर्तियां विशेष रूप से गृह प्रवेश या किसी को उपहार स्वरूप भेंट करने के लिए तैयार की जाती हैं।
धूप-अगरबत्ती और खाद्य सामग्रियों का अनूता प्रयोग कला और आस्था के अनूठे संगम के तहत इस वर्ष लगभग 12 फीट ऊंची एक विशाल मूर्ति को पूरी तरह से धूप-अगरबत्ती के उत्पादों से तैयार किया गया है। इसे बनाने में करीब तीन महीने का समय लगा है। इसमें अलग-अलग रंग की धूप की स्टिक का इस्तेमाल किया गया है। जिसमें गीली धूप से माला, पुष्प और कड़े जैसी सजावट तैयार की गई है। मूर्तिकारों का कहना है कि समिति वाले हमें अपनी पसंद का स्ट्रक्चर बताया था और उसी के अनुसार हम मूर्ति तैयार कर रहे हैं। मिट्टी की मूर्ति की तुलना में इन मूर्तियों को बनाना थोड़ा आसान है, क्योंकि यह हल्की होती है और इसे जरूरत के अनुसार हिलाकर अलग-अलग जगह पर काम किया जा सकता है। इसके साथ ही, खाने-पीने की सामग्री से भी एक अद्भुत गणेश मूर्ति का निर्माण किया गया है, जिसमें मुख्य रूप से मसूर दाल, चना और भुट्टे का उपयोग किया गया है. विभिन्न खाद्य अनाजों को करीने से सजाकर मूर्ति को एक आकर्षक रूप दिया गया है, जो स्थानीय लोगों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
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