20 फीट ऊंचे अधूरे पुल पर जान हथेली पर रखकर नदी पार कर रहे आदिवासी बच्चे, 5 साल से अधूरा निर्माण बना मुसीबत
गरियाबंद। जिले में विकास की तस्वीर को शर्मसार करने वाली एक तस्वीर सामने आई है। देहारगुड़ा-खामभाठा के बीच पैरी नदी पर पिछले पांच साल से अधूरा पड़ा पुल अब ग्रामीणों और स्कूली बच्चों के लिए मुसीबत का सबब बन गया है। बारिश के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ ही खतरा और बढ़ गया है, बावजूद इसके मजबूरी में बच्चे अधूरे पुल के रास्ते स्कूल आने-जाने को विवश हैं।
करीब 20 फीट ऊंचे पिलरों पर बने इस खतरनाक रास्ते को ग्रामीणों ने मानो ‘मौत की सीढ़ी’ का नाम दे दिया है। पुल के अधूरे हिस्सों में जगह-जगह सरिए बाहर निकले हुए हैं, वहीं रास्ता बेहद जोखिम भरा है। जरा सी चूक किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकती है।
सबसे चिंताजनक स्थिति स्कूली बच्चों की है। शिक्षा हासिल करने के लिए इन आदिवासी बच्चों को अपनी जान जोखिम में डालकर अधूरे पुल से गुजरना पड़ रहा है। बारिश के दौरान फिसलन और नदी के बढ़ते बहाव के बीच यह सफर किसी खतरे से कम नहीं है।
बताया जा रहा है कि पुल का निर्माण लंबे समय से अधर में लटका हुआ है। कलेक्टर की फटकार के बावजूद निर्माण कार्य की रफ्तार धीमी बनी हुई है। ऐसे में ग्रामीणों में प्रशासन और निर्माण एजेंसी के प्रति नाराजगी लगातार बढ़ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द ही पुल का निर्माण पूरा नहीं किया गया और बच्चों की सुरक्षा के लिए ठोस व्यवस्था नहीं की गई, तो वे NH-130C पर आंदोलन और चक्काजाम करने के लिए मजबूर होंगे।
बड़ा सवाल: पांच साल से अधूरा पुल आखिर कब होगा पूरा?
एक तरफ सरकार गांव-गांव तक बेहतर सड़क और पुल-पुलिया पहुंचाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ गरियाबंद में आदिवासी बच्चों का स्कूल पहुंचना ही जान जोखिम में डालने जैसा हो गया है। अब देखना होगा कि प्रशासन की चेतावनी और ग्रामीणों के आक्रोश के बाद इस अधूरे पुल का निर्माण कब तक पूरा होता है।
गरियाबंद में ‘मौत की सीढ़ी’ पर स्कूल का सफर!
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